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तरीघाटः जगतपाल का किला उर्फ रावण टीला

मिट्टी के नीचे सोता हुआ अज्ञात इतिहास

पिछले लगभग दो वर्षों से राजिम में रहते हुए कुछेक बार दुर्ग जाना हुआ। यहां से रायपुर होकर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती क्योंकि अभनपुर से पाटन होते हुए सीधे भिलाई व दुर्ग जाने का शानदार रास्ता है। पाटन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का विधानसभा क्षेत्र है इसलिये इस रास्ते को शानदार बनाया गया था। अब भी इसकी हालत बढ़िया है। मूलतः यह कृषि प्रधान इलाका होने से इस पर से गुजरना सुकून भरा होता है। ज्यादा यातायात नहीं और हरे-भरे परिदृश्य। उन्हें निहारते हुए चले जाइये!

रास्ते में पुरातात्विक महत्व का एक छोटा सा गांव पड़ता है- तरीघाट, जो कि खारून नदी के किनारे पर बसा है। यहां करीब 7.5 हेक्टेयर भूभाग पर इतिहास, मिथ, पौराणिकता तथा किंवदंतियां सारा कुछ एक-दूसरे से मिल जाता है। टूटे-फूटे एक किले और किसी गुम हो चुकी सभ्यता के अवशेष बिखरे पड़े हैं।

भारत में बहुत से शहरों के भग्नावशेष जो मिलते हैं उनमें ईंटों का प्रयोग की हुई संरचनाएं हैं- फिर वे चाहे पूर्व या उत्तर वैदिक काल की हों अथवा बौद्धकालीन। अपने देश के अलावा नेपाल, श्रीलंका आदि में कई ऐसे खंडहरों को देखने के बाद साफ लगता है कि जहां पत्थरों का प्रयोग हुआ है, वे खंडहर अपेक्षाकृत नये होने चाहिये। राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश में कई ऐसे अवशेष देखे हैं।

तरीघाट (रायपुर से करीब 30 किलोमीटर दूर) में मिट्टी से पटे एक टीले की जब संस्कृति व पुरातत्व विभाग के तत्कालीन उप संचालक जेआर भगत के निर्देशन में खुदाई हुई तो वहां से जिस संरचना ने न जाने कितनी सदियां दबे रहने के बाद सूरज का प्रकाश देखा, तो उसे नाम दिया गया ‘जगतपाल का किला’ या जिसे स्थानीय लोग ‘रावण का टीला’ कहते आए हैं। यह नाम इसलिये पड़ा है क्योंकि रावण दहन इसी टीले के पास होता है। वहां एक बड़े चबूतरे पर लंकापति की तस्वीर भी ग्रामवासियों ने बना रखी है जिसमें रावण भईया बहुतै स्मार्ट दिख रहे हैं।

पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यहां लगभग ढाई हजार साल पहले तक कोई विकसित सभ्यता थी- मोहन-जोदाड़ो की तरह ही। यह सभ्यता काफी लम्बी अवधि तक विद्यमान रही। ऐसा विभिन्न काल के मिले पुरावशेषों के आधार पर अनुमान लगाया जाता है। यहां पर से कुषाण, सतवाहनों तथा कलचुरी शासकों के वक्त के सिक्के, मनके आदि मिले हैं। यहां तक कि इंडो-ग्रीक मुद्राएं भी प्राप्त हुई हैं। कहते हैं कि तरीघाट मनके बनाने का स्थल तथा व्यापारिक केन्द्र था। बहुत सम्भव है कि निकट से बहने वाली खारून के जरिये इसके तट से व्यवसाय होता रहा होगा और उसी खारून ने कभी आई हुई बाढ़ में इसे डुबो दिया होगा।

इस पर अभी और शोध किया जाना चाहिये। पहली ज़रूरत तो इसे ठीक से संरक्षित किये जाने की है क्योंकि पर्याप्त देख-रेख का अभाव साफ दिखता है। सिरपुर तथा सरगुजा की नाट्यशाला, सीताबेंगरा आदि को जैसे सम्हाला गया है- वैसा ही इस पर ध्यान दिया जाना चाहिये।

साफ कर दूं कि मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं लेकिन इस पर कुछ पहले से स्थापित मान्यताओं तथा खुद के कच्चे-पक्के अनुमानों के आधार पर जो सोच पा रहा हूं, वही लिख रहा हूं। (जैसे बिना ज्ञान व जानकारी के कई विषयों पर लिखता रहता हूं।🤣)

जो भी हो, इतिहास को जानने तथा यायावरी में रुचि रखने के कारण वर्षों से मैं यहां जाने की सोचता तो रहा लेकिन यह अवसर मुझे पिछले रविवार (23 नवम्बर को) को मिला जब मुझे एक शादी में दुर्ग जाने का अवसर मिला। बढ़िया जगह है जी… ! यहीं पर महामाया मंदिर भी है।

दीपक पचपोरे