ठाकुर जगमोहन सिंह और शिवरी नारायण

आज मेरी वर्षों पुरानी साध पूरी हुई। बरसों से मेरे मन में यह साध थी कि मैं ठाकुर जगमोहन सिंह की सृजन स्थली शिवरी नारायण जाऊं और उन्नीसवीं शताब्दी के इस महान लेखक की कर्मस्थली का दर्शन करूं।
यह भी कि विहंगम और अगाध जलराशि से परिपूर्ण महानदी को जी भरकर निहार सकूं । जिस तरह कभी
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में तहसीलदार की सरकारी नौकरी करते हुए विशेषकर सन 1882 _1884 के मध्य ठाकुर जगमोहन सिंह निहारते रहे होंगे।
मन के किसी कोने में यह भी था कि नवयौवना श्यामा की छवि भी जो ठाकुर जगमोहन सिंह के चित्त में अपने संपूर्ण रूप माधुर्य के साथ जिस तरह से बसी रही होगी, उसे भी महानदी के साव घाट के निकट जाकर निहार सकूं , जहां नियम पूर्वक श्यामा जलक्रीड़ा करती रही होगी और उसके लौटने की प्रतीक्षा में ठाकुर जगमोहन सिंह देर तक आंखें बिछाए बैठे रहते रहे होंगे । उसके भीगे हुए केशराशि की भीनी _भीनी सी सोंधी खुशबू को अपने भीतर तक भर लेने की कामना के साथ ।
अपनी हर रचना का नामकरण श्यामा के नाम से प्रारम्भ करने के पीछे कोई तो बात होगी ।
कहते हैं श्यामा ब्राह्मण कुल की अपूर्व सुंदरी नवयुवती थी जो असमय विधवा हो गई थी। कहते तो यह भी हैं कि जिसने अपने रूप माधुर्य से भारतेंदु हरिश्चंद्र के परम प्रिय मित्र ठाकुर जगमोहन सिंह को मुग्ध कर दिया था।
यह अनोखा संयोग और श्यामा के प्रति आसक्ति ही है कि वर्ष 1885 में लिखित अपने उपन्यास का नाम भी उन्होंने ’श्यामा स्वप्न’ रखा । ’श्यामा सरोजिनी’ की रचना वे पहले ही कर चुके थे ।
विजय राघव गढ़ रियासत के राजकुमार ठाकुर जगमोहन सिंह को शिवरी नारायण की इस उर्वर भूमि ने , महानदी की अगाध जलराशि और श्यामा के रूप माधुर्य ने रचनात्मक ऊर्जा प्रदान की और इस भूमि को एक नई ऊष्मा से आप्लावित कर दिया ।
आज इसीलिए ठाकुर जगमोहन सिंह की इस पवित्र भूमि को नमन कर मेरे हृदय को अपार शांति प्राप्त हुई है । महानदी को देखकर लगा कि महानदी शिवरी नारायण में ही अपनी मुग्धा रूप में दिखाई देती है और अपने रूप माधुर्य से चकित कर देती है।
ठाकुर जगमोहन सिंह की स्मृति में नवनिर्मित ठाकुर जगमोहन सिंह ग्रन्थालय एक तरह से यह जाहिर करता है कि आधुनिकता की तेज दौड़ में भागते और डगमगाते हुए समय में भी शिवरीनारायण डेढ़ सौ वर्ष पूर्व के अपने इस महान लेखक को आज भी याद करता है। आज भी प्यार करता है।
