जो हुआ वह कम है क्या

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इस्लामाबाद मे क्या हुआ यह फिलहाल गौण बात है।
असल बात वह है जो 28 फरवरी से कल 11 अप्रैल तक के दरमियान हुई :

◾ फ़्रांस के वीटो, द. कोरिया के राष्ट्रपति के बयान, इटली द्वारा युद्ध तक छेड़ने की चेतावनी और स्पेन से लगातार जारी जूतों की बौछार से साफ है कि इस महीने मे इजराइल जितना अलग थलग पड़ा है उतना कभी नहीं रहा।

◾ अमरीका की धोती खुल गयी है। वह दुनिया के सामने निशक्त, पिटा पिटाया, निर्वस्त्र खड़ा है। सिर्फ ठरकी ट्रम्प ही नहीं, समूचा अमरीकी शासक वर्ग खुद अमरीका की जनता के कोप का जितना शिकार आज है उतना पहले कभी नहीं रहा। इस बार स्थिति वियतनाम युद्ध से भी आगे की है।

◾ अमरीका के लिए संकट फ़ौरी हार या फजीहत या कुत्ता-घसीटी की नहीं है, पेट्रो-डॉलर का गुब्बारा पिचक जाने से न सिर्फ उसका वर्चस्व टूटने के आसार बने हैँ बल्कि साम्राज्य के मौजूदा रूप का अस्तित्व भी खतरे मे हैँ। एक ऐसा खतरा जिससे उबरना उसके लिए नामुमकिन होगा।

◾नतीजे मे छोटे और अविकसित, धीमी गति से विकासशील देश और अब तक पिछलग्गू माने जाने वाले देश – जैसे श्रीलंका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका आदि – मुखरता से बोलने लगे हैँ।

◾ नाटो बिखराव के कगार पर है। एकध्रुवीयता का तिलिस्म टूटा है। नए गठबंधनों की सम्भावनायें खुली हैँ।
और
◾ फिलिस्तीन का नरसंहार दुनिया की – अब तक खामोश देशों की भी – निंदा का मुद्दा बना है।

समझौता हुआ या नहीं, होगा कि नहीं, उससे ज्यादा बड़ी बात है यह है कि झक मारकर बातचीत की टेबल पर बैठना पड़ा।

इत्ताबहुत नहींहै क्या

अब क्या बच्चे की जान ही लोगे

बादल सरोज

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