एक, एक बड़ी खबर है

तालाबों में एक का इजाफा भी बड़ी खबर होती है। दीवारों से होकर चौपालों तक, चौपालों से घर-घर तक, और घरों से निकलकर दूर बसे समधी-सजन तक बात पहुंच जाती है। एक का इजाफा होना यानी गांव का थोड़ा और सुखी, थोड़ा और संपन्न होना। अब रिश्तेदारियां भी और निभेंगी, कोई पिता शान से अपनी बेटी यहां ब्याहना चाहेगा, और उतनी ही शान से यहां की बेटियां विदा भी होंगी।
एक का इजाफा, मतलब एक आगर। और तालाबों की परंपरा में “आगर” हमेशा से प्रतिष्ठा का विषय रहा है। हमारे गांवों में कभी “छः कोरी छः आगर” तालाब हुआ करते थे, यानी जरूरत से कहीं ज्यादा, एक तरह की निश्चिंतता। पानी का होना ही नहीं, पर्याप्त से अधिक होना।
असल में, यही सोच छत्तीसगढ़ के समाज की जड़ में रही है—पानी को रोको, सहेजो, बढ़ाओ। लेकिन बीच के वर्षों में यह लय कुछ टूटी। पानी का इस्तेमाल बढ़ा, पर उसे थामने की आदत कमजोर पड़ती गई। नतीजा, जहां कभी भरापूरा था, वहां अब मौसम पर निर्भरता बढ़ने लगी।
अब जो बदलाव दिख रहा है, वह उसी पुरानी समझ की वापसी जैसा है, बस तरीके थोड़े नए हैं। “मोर गांव–मोर पानी” अभियान के तहत गांव-गांव में फिर से पानी को रोकने की कोशिशें तेज हुई हैं। मनरेगा के जरिए आजीविका डबरी और नवा तरिया बन रहे हैं। आंकड़ों में देखें तो हजारों डबरियां और सैकड़ों तरिया, लेकिन जमीन पर देखें तो हजारों परिवारों की लाखों कहानियां।
किसी के खेत में पहली बार पानी ठहरा है, तो कहीं सूखता कुंआ फिर से भरने लगा है। कहीं लोग मछली डालने की बात कर रहे हैं, तो कहीं दूसरी फसल की तैयारी हो रही है। यह बदलाव एक साथ नहीं, लेकिन लगातार दिख रहा है।
महत्वपूर्ण यह भी है कि यह काम लोगों के भीतर से उठता दिख रहा है। कहां तरिया बनेगा, किसके खेत में डबरी बनेगी—यह बात गांव खुद तय कर रहा है। महिलाएं काम में दिख रही हैं, युवा जुड़ रहे हैं, और जो बन रहा है, वह सबकी नजर में है।
धीरे-धीरे एक बात फिर से साफ हो रही है कि पानी अगर गांव में टिकेगा, तो समृद्धि भी यहीं टिकेगी। और शायद इसी लिए, आज भी एक आगर तालाब का होना सिर्फ एक निर्माण नहीं, बल्कि पूरे गांव की उम्मीद का बढ़ना है।
इसी बदलाव की झलक आंकड़ों में भी दिखती है। अब तक लगभग 12,000 आजीविका डबरियों का निर्माण किया जा चुका है, जिनमें से बड़ी संख्या SC, ST और PVTG परिवारों की निजी भूमि पर है। इसके साथ ही करीब 500 ‘नवा तरिया’ सामुदायिक स्तर पर बनाए जा रहे हैं या निर्माणाधीन हैं।
इनसे सीधे-सीधे असर दिख रहा है—खेत में पानी ठहर रहा है, सिंचाई का दायरा बढ़ा है, कई जगहों पर दूसरी और तीसरी फसल संभव हुई है, और मछली पालन जैसे अतिरिक्त आय के स्रोत भी खुले हैं। हजारों ग्रामीणों को मनरेगा के तहत रोजगार मिला है, लेकिन उससे भी आगे बढ़कर अब यही संरचनाएं स्थायी आजीविका का आधार बन रही हैं।
यह केवल संख्या बढ़ने की बात नहीं है। यह उस भरोसे के लौटने की बात है कि अगर पानी को गांव में रोका जाए, तो समृद्धि भी यहीं टिक सकती है।

छत्तीसगढ़ कैडर के 2012 बैच के आईएएस अधिकारी तारण प्रकाश सिन्हा वर्तमान में आयुक्त (Commissioner), मनरेगा (MGNREGS) के पद पर पदस्थ हैं। यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है
