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सोनभद्र नरसंहार कांड का सच

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बनारस से सटे सोनभद्र जनपद में 16 जुलाई 2019 को दबंग भूमाफिया ने अवैध तरीके से आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए खूनी खेल खेला। हथियारबंद 300 लोगों ने निर्दोष वनवासियों पर करीब आधे घंटे तक अंधाधुंध फायरिंग की। इस घटना में 10 आदिवासी मौके पर मारे गए और 25 से ज्यादा अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।


बड़ी बात यह है की घटना के समय वनवासियों ने सोनभद्र के एसपी व कलेक्टर से लेकर सभी आला अफसरों को फोन किए। सभी के मोबाइल बंद मिले। 100 डायल पुलिस आई, पर तमाशबीन बनी रही। इस पुलिस के सामने ही चार वनवासियों को गोलियों से छलनी किया गया। घोरावल थाना पुलिस के अधीन वाले इस इलाके में पुलिस तब पहुंची, जब हत्यारे नरसंहार कांड रचने के बाद सुरक्षित स्थानों पर पहुंच गए।


घटना के बाद मौके पर कोई प्रशासनिक अफसर नहीं गया। सत्तारूढ़ दल के किसी नेता ने भी शोक संवेदना व्यक्त करने की जरूरत नहीं समझी। अलबत्ता पुलिस नरसंहार कांड की अगुआई करने वाले ग्राम प्रधान यज्ञदत्त के घर की सुरक्षा करती नजर आई। इस मामले में घोरावल पुलिस तो कटघरे में थी ही, सोनभद्र के एसपी और डीएम भी कम कसूरवार नहीं।


अब से पहले इतने संवेदनहीन अफसर सोनभद्र में कभी नहीं आए थे। मिर्जापुर के कलेक्टर रहे एक आईएएस अफसर ने आदिवासियों की जमीन हथियाई और बाद में उसे भू-माफिया के हाथ बेच दिया। साल 1955 से मुकदमा लड़ रहे वनवासियों को न्याय नहीं मिला। जमीन राजा बड़हर की थी और बाद में वह ग्राम सभा की हो गई। रिश्वतखोर अफसरों ने योजनाबद्ध ढंग से उनकी जमीन भू माफिया के हवाले कर दी।


हैरान कर देने वाली बात यह है की वनवासियों से उनकी जमीन छीनने के लिए दर्जनभर लोगों को गुंडा एक्ट में निरुद्ध किया गया और उन्हें जिलाबदर भी करवा दिया गया। करीब 60 आदिवासियों पर फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए, जिसकी आड़ में पुलिस ने जमकर मनमानी की। पुलिस ने आदिवासियों को लूटा ही, महिलाओं की आबरू से खेला भी।
नरसंहार कांड के बाद उभ्भा गांव में महिलाओं व बच्चों की चीत्कार दिल को छलनी कर देती है। इसे बेशर्मी कहें या हठधर्मिता, इन महिलाओं की चीख सीएम योगी आदित्यनाथ और उनके नुमाइंदों को सुनाई नहीं दे रही है। हम तो अपने आंसू नहीं रोक पाए। भू माफियाओं ने जिन महिलाओं की मांग का सिंदूर पोंछ डाला, उनकी वेदना आप भी सुनिए, जरूर रो पड़ेंगे…।
विजय विनीत की पोस्ट

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