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ना डरे हैं, ना झुके हैं, ना रुके है.

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बस्तर में कलम की डगर दुधारी तलवार है। यहां कदम-कदम पर सख्त पहरा है। कभी पुलिसिया तो कभी नक्सलियों की नजर में हम चुभते है।
साल 2013 पत्रकार नेमीचन्द और फिर पत्रकार साईं रेड्डी की हत्या। नक्सलियों को इनसे कैसा खतरा पनपा की वो जान लेने पर उतारू हो गए। हाँ ये जरूर हुआ कि इनकी हत्या के बाद इसे महज संगठनातमक त्रुटि का हवाला देकर माओवादियों ने अपना पलड़ा झाड़ लिया।
आज एक बार फिर बस्तर में कलमकार नक्सलियों की नजरों में कील नजर आया है। बीजापुर के एक निष्पक्ष, निर्भीक और सदैव आदिवासी हित को लेकर जमीनी पत्रकारिता का चेहरा बनने वाले पत्रकार गणेश मिश्रा के विरुद्ध नक्सलियों ने जो संगीन आरोप लगाए है, ये ना सिर्फ दुखद है बल्कि पत्रकारिता को सीधे बन्दूक की नोक की चुनौती है।
मेरा सवाल नक्सलियों से…. एक निष्पक्ष, जमीनी पत्रकार को निशाने पर लेने की क्या वजह रही?
मैं पूछना चाहता हूँ कि जिस पर्चे में दलाली का आरोप का उल्लेख है उसमें आरोपों को सिद्ध करने से गुरेज क्यों?

हम पत्रकार है जो कठिन हालात में बस्तर के आदिवासियों से जुड़े मसले को बाहर लाते रहे है, तो क्या नक्सलवाद की “गन” नीति कलम पर उस पहरे की तरह मान ले जिसमे राजतंत्र “कलम” पर निगाहें बनाई होती है..

हम हर परिस्थिति से लड़ते रहे है आज एक बार फिर बस्तर के निष्पक्ष कलमकार को “गन” ने चुनौती दी है।
हम तत्पर है, हम पत्रकार है, तैयार रहो.. आ रहे हैं हम
अब सवाल हमारे होंगे, जबाब तुम्हे देना होगा।

मुकेश चंद्राकर

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