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इस बार छत्तीसगढ़ में धूमधाम मनाया जाएगा किसानों का त्योहार ‘हरेली तिहार’

छत्तीसगढ़। धान के कटोरा के नाम से मशहूर छत्तीसगढ़ में त्योहारों की शुरूआत हरेली से होती है, इस दिन किसान खेती में उपयोग होने वाले सभी औजारों की पूजा करते हैं। गाय-बैलों की भी पूजा की जाती है। गेंड़ी सहित कई तरह के पारंपरिक खेल भी हरेली के आकर्षण होते हैं। एक अगस्त को हरेली त्योहार में पूरे राज्य को छत्तीसगढ़िया कलेवर और छत्तीसगढ़ी रंग से सजाया-संवारा जाएगा।

इस साल राज्य सरकार ने हरेली पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है, वहीं कृषि पर आधारित इस त्यौहार को ”हरेली तिहार” के माध्यम से छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से भी राज्य में मनाने का निर्णय लिया गया है।

छत्तीसगढ़ी भाषा का की-बोर्ड बनाने में गूगल को अपना सहयोग देने वाले प्रसिद्ध ब्लॉगर संजीव तिवारी हरेली को लेकर कहते हैं, “छत्तीसगढ़ के उत्सवधर्मी जिंदादिल निवासी, कृषि संस्कृति के वाहक हैं, धान के कटोरा के रूप में प्रतिष्ठित इस भू-भाग के लोक में वर्ष का पहला त्‍यौहार ‘हरेली’ है। यह कृषि कार्य के पहले सोपान को सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेने के उल्लास की अभिव्यक्ति के रूप में मनाई जाती है।

हरेली तिहार में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण खेल-कूद का आयोजन किया जाएगा, छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्टॉल लगाया जाएगा, खेल-कूद स्पर्धाओं में पुरस्कार वितरण किया जाएगा और प्रतीकात्मक पौधारोपण को प्राथमिकता दी जाएगी। इस अवसर पर गेड़ी दौड़ जैसी ग्रामीण खेलकूद प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाएंगी और छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाएगा। इसी तरह गांवों में नवनिर्मित गौठानों का लोकार्पण भी किया जाएगा।

हरेली, जिसे हरियाली के नाम से भी जाना जाता है इसे छत्तीसगढ़ में प्रथम त्योहार के रुप में माना जाता है। सावन की अमावस को मनाया जाने वाला पर्व हरेली खेतिहर- समाज का पर्व है।

संजीव आगे कहते हैं, “वर्तमान के अनियमित ऋतुचक्र के पूर्व सावन मास की अमावस्या तिथि तक खेतों में बुवाई आदि का कार्य पूर्ण हो जाता था। किसान का मेहनत सफल होता था और बीज से निकल कर धान अपने न्‍यून वय में ही लहलहाने लगता था। चारो ओर हरियाली नजर आने लगती थी। किसान लोक झूमने लगता था, थके श्रम को पुनः अगले सोपान के लिए जागृत करने। लोक का यही थिरकन त्‍यौहार है।”

हरेली में खेती किसानी में उपयोग आने वाले औज़ार पूजा, बैलों व गायों की पूजा, घरों में नीम की पत्तियों का लटकाना, चौखटों में कील लगाना सब प्रतीक है। सामान्‍य शब्‍दों में घर आदि का मरम्‍मत, उपकरणों में तेल-ग्रीस और जीवों में रोगप्रतिरोधक शक्तियों का प्रयोग। प्रतीकों में परम्परा का स्वरूप चाहे जो भी रहा हो लेकिन यह मूलतः श्रमपरिहार और उत्साह की जुगलबंदी का त्यौहार है। साथ ही यह पर्यावरण के प्रति इस धरती के मनखे का लगाव और प्रकृति के प्रति प्रेम और समर्पण का साक्ष्‍य है।

इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ प्रदेश की कला-संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों से युवाओं को अवगत कराने के लिए सजग छत्तीसगढ़ क्रांति सेना की अगुवाई में बीते कई वर्षों से जबर हरेली मना रही है। जहां हरेली रैली निकाल कर छत्तीसगढ़िया संस्कृति की झलक दिखाई जाती है। पंथी, राउत नृत्य, बैलगाड़ी रैली आकर्षण का केंद्र रहता है।

तामेश्वर सिन्हा

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