
उमर खालिद पाँच साल से UAPA केस में बिना ट्रायल के जेल में हैं। आज सुप्रीम कोर्ट ने जमानत नहीं दी और कहा—एक साल और। लेकिन यह नहीं बताया कि यह “एक साल” क्यों और कैसे तय हुआ। पाँच साल काफी नहीं थे क्या?
सबसे बड़ा सवाल यही है, बिना मुकदमा पूरा हुए कोई अपनी ज़िंदगी के इतने साल जेल में गुज़ार दे। न फैसला, न सुनवाई का अंत—बस इंतज़ार।
कोर्ट का काम डर से नहीं, न्याय से चलना है। नागरिक और राज्य, दोनों उसके सामने बराबर होने चाहिए। अगर तराज़ू एक तरफ झुकने लगे, तो न्याय की उम्मीद टूटने लगती है।
उमर खालिद का मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति का नहीं, यह सवाल हम सबका है। क्या बिना ट्रायल इंसान को यूँ ही सालों तक कैद रखा जा सकता है?
कल सुप्रीम कोर्ट ने जिन पांच लोगों को जमानत दी है, उनपर 11 शर्तें भी थोपी हैं।
उन्हें सप्ताह में दो बार पुलिस मुख्यालय पर हाजिरी देनी होगी।
वो किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकती/सकते। वर्चुअल मीटिंग में भी शामिल नहीं हो सकते।
कोई पर्चा पुस्तिका नहीं छाप सकते
सोशल मीडिया पर कोई भी पोस्ट नहीं डाल सकते, कोई इंटरव्यू नहीं दे सकते।
बिना अनुमति के दिल्ली नहीं छोड़ सकते।
अंतिम बिंदु सबसे मजेदार है कि उन्हें अच्छा व्यवहार बनाए रखना होगा।
यानी इसका मतलब यही है कि उन्हें अपनी आजादी और अपनी ज़ुबान तिहाड़ जेल में छोड़कर ही बाहर आना होगा। 😥😥
