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मंत्रोच्चार और शंखध्वनि से उद्घाटित,देश की संसद टपक रही

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बादल सरोज

टपक रही है
यज्ञ की वेदी के चारो और ठठ के ठठ लगाए बैठे, उन्नत उदरों और लहराती दाढ़ियों वाले आचार्यों, मठाधीशों, मण्डल और महामण्डलेश्वरों के न समझ आने वाले शब्दों के वृंदगान
… और श्रंगेरी से बुलाये, सर्वोत्तम द्विज, शुद्ध और शास्त्र मर्मज्ञ ब्राह्मण पुरोहितों के गगनभेदी मंत्रोच्चार और शंखध्वनि
… और
धधकते हवन कुंड, महकते लोबान , गूंजती आरतियों में रोली , अक्षत और सीधे गंगोत्री से लाये पवित्र जल से शुद्ध की गई
संसद ।

सदियों की तरह इस बार भी, नीली बाल्टी को ही दिया गया है रिसती, टपकती, चुचाती छत की सारी रिसन, टपकन और चुअन को बूंद बूंद कर सहेजने का जिम्मा ;
ताकि जमीन पर न आ जाये फिसलन
कि कहीं फिसल के गिर न पड़ें दुर्योधन ।

उन्हें भरम है कि नीली बाल्टियाँ, बिना कोई उज्र किये इसी तरह, यूँही निष्ठा के साथ निबाहती रहेंगी उच्छिष्ट को इष्ट मानने की शिष्टता ।

पता नहीं उन्हें यह पता है कि नहीं पता कि नीली बाल्टियां सीख रही हैं लाल आंख दिखाना, सेंगोल लिए लम्बलोट होने वाले के सम्मोहन से बाहर आना, अतीत के प्रेतों से मुक्ति पाना, वे सीख रही हैं समुद्र मंथन के शास्त्रसम्मत नियमों पर चलकर कांवड़ में अमृत ढो के धामों तक पहुंचा खुद नीलकंठ बनने से साफ इनकार करना ।

उनकी जिद है रोशनी में बराबरी से हिस्सा पाने की, धरती के इस हिस्से के नीले आकाश में लाल सूरज, हर दिन, सबके लिए एक साथ उगाने की ।

लेखक जनवादी पत्रिका *लोकजतन* के संपादक हैं

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