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नव-बारहमासा-आज की कविता :

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आषाढ़ में फैलती ही हैं बीमारियाँ
सावन-भादो में आती ही है मंदी
आसिन बहुत उपयुक्त है दंगों के लिए
कतिकसन की भूखमरी नामी है
अगहन में बढ़ जाती है बेरोजगारी
पूस में नीलगायें चर ही जाती रही हैं खेत
माघ मरणोत्सव है फुटपाथियों के लिए
फागुन में होते रहते हैं बलात्कार
चैत चेतने का महीना कतई नहीं है
बैसाख में मूर्ख बनायी जाती है जनता
जेठ का उबाल रहे खून में
फिर बच्चे बीमार हों
और मरें चढ़ते जून में…

यही अटल सत्य है
इसे जानते हुए जो रहे निर्विकार
वही है सच्ची सरकार

जय-जयकार…
जय-जयकार…

अस्मुरारीनंदन मिश्र

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