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इस सरकार को एक मुर्दा समाज चाहिए जो उसके किसी भी धतकरम पर खामोश रहे और जब कहा जाए तो ताली बजा दे ! आप ताली बजाइए !!

कृष्ण कांत

पहले यूपीए के दौरान प्रो साईंबाबा जैसे लोगों को नक्सल बताकर प्रताड़ित करना शुरू किया गया. सैकड़ों कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया गया. हिमांशु कुमार जैसे समाजसेवी के घर पर बुल्डोजर चलाए गए और उन्हें भगा दिया गया.

आदिवासी जनता की सेवा करने वाले डॉक्टर विनायक सेन को सालों प्रताड़ित किया गया, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बाइज्जत बरी किया और सरकार को फटकार लगाई.

उसके बाद आई बीजेपी और मोदी सरकार ने इस अभियान को नए पड़ाव पर पहुंचा दिया. आईटी सेल ने जनता को बताना शुरू किया कि जो भी जनता के हक में, सरकार के खिलाफ बोलता है, वे सब अर्बन नक्सल हैं.

यूपीए को बार बार कोर्ट में पटकने वाले प्रशांत भूषण से लेकर कवि वरवरा राव, चिंतक आनंद तेलतुंबड़े, आदिवासियों को जीवन समर्पित कर देने वाली सुधा भारद्वाज समेत तमाम प्रोफेसर, बुद्धिजीवी और लेखकों को नक्सल बताया जाने लगा.

फिर उनपर दमन चक्र चलना शुरू हुआ. भीमा कोरेगांव में एक फूहड़ थ्योरी गढ़ी गई और दर्जन भर लोगों को जेल में डाल दिया गया. प्रोफेसर हनी बाबू को कुछ दिन पहले गिरफ्तार किया गया है.

ऐसी गिरफ्तारियों पर सबसे ज्यादा मुखर रहने वाले प्रोफेसर अपूर्वानंद को भी पुलिस ने बुलाकर दिल्ली दंगों के सिलसिले में पूछताछ कर ली है और उनका मोबाइल जब्त कर लिया है.

​सीसीए आंदोलन के दौरान एसआर दारापुरी जैसे रिटायर्ड अधिकारी और बुजुर्ग को प्रताड़ित किया गया. पिजरा तोड़ की लड़कियों को दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड साबित करने की कोशिश की जा रही है. जिसने सरेआम दंगे की धमकी दी, उसे अभयदान दे दिया गया.

यह सब एक मरा हुआ समाज बनाने का प्रोजेक्ट है. विरोध, प्रदर्शन और असहमति के अगुआ लोगों को देशद्रोही साबित करके जेल में डाल दीजिए तो बोलने वाला कोई नहीं बचेगा.

सरकार को एक मुर्दा समाज चाहिए जो उसके किसी भी धतकरम पर खामोश रहे और जब कहा जाए तो ताली बजा दे. आप ताली बजाइए, लेकिन ये सोचना सिर्फ आपका काम है कि आपकी आने वाली पीढ़ी को कैसा समाज चाहिए, मुर्दा या जिंदा? भारत जैसा एक विशाल और उदार लोकतंत्र चाहिए या पाकिस्तान और सीरिया जैसे मजहबी कट्टर राष्ट्र?

क्या भगत सिंह और अशफाक जैसे युवा इसीलिए शहीद हुए थे कि एक दिन उन्हीं की विचारधारा के लोगों को जेलों में ठूंस दिया जाएगा? क्या एक सदी के संघर्ष ने इसी दिन का सपना देखा था? आप किस दिन का सपना देखते है?

जिस समाज में लेखक, बुद्धिजीवी, कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार और तमाम न्यायप्रिय लोग जेल में ठूंस दिए जाएंगे तो उस देश में रहेगा कौन? चलेगी किसकी? लोकतंत्र के इस ‘विकास दुबे मॉडल’ का सपना किसकी आंखों में पल रहा है?

कृष्ण कांत

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